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महज पांच साल में अर्श से फर्श पर आया 'किंग'नई दिल्ली/ सातवां आसमान छूने के अंदाज में धमाकेदार शुरुआत करने वाली किंगफिशर एयरलाइंस महज पांच-छह साल में किस तरह बदहाली के कगार पर आ पहुंची,

यह दास्तान विमानन उद्योग ही नहीं समूचे कॉरपोरेट जगत में चर्चा का विषय बनी हुई है। सन 2005 में किंगफिशर की लांचिंग के समय उसके रंग-ढंग देखकर उम्मीद की जा रही थी कि आने वाले समय में यह कंपनी घरेलू एयरलाइन उद्योग की दिशा बदल कर रख देगी।

हालत अंदर ही अंदर खस्ता हो रही
अपनी अलग कार्यशैली और सेवाओं के दम पर किंगफिशर ने उस समय घरेलू विमानन उद्योग के आकाश पर छाई इंडियन एयरलाइंस और जेट एयरवेज को कड़ी टक्कर देकर बाजार में अपना अलग मुकाम हासिल किया। यात्रियों को प्रतिस्पर्धी किराये की पेशकश कर किंगफिशर ने काफी कम समय में बहुत से लोगों की पहली पसंद बन गई। ऐसे दमदार शुरुआती प्रदर्शन के बावजूद धीरे-धीरे उसकी वित्तीय हालत अंदर ही अंदर खस्ता होती चली गई। इसके लिए जानकार कंपनी की ओर से लिए गए कुछ गलत फैसलों और विमानन उद्योग से जुड़ी कई तरह की व्यावहारिक कठिनाइयों को जिम्मेदार मानते हैं।

शेयर बाजार में भी जोरदार पिटाई
हवाई कारोबार में काफी कम समय में 'दबंग' हैसियत हासिल करने वाले 'किंग' की बदहाली का आलम यह है कि मंगलवार को लगातार चौथे दिन उसकी 25 से ज्यादा उड़ानें रद्द हो चुकी है। कंपनी के खातों में इतने पैसे भी नहीं है कि वो अपने कर्मचारियों को सैलरी दे सके। पिछले 4 दिनों में सैकड़ों उड़ाने रद्द कर चुकी किंगफिशर की शेयर बाजार में भी जोरदार पिटाई हो रही है। हालांकि मंगलवार को शेयर 0.75 फीसदी की मामूली बढ़त के साथ 26.80 रुपये के भाव पर रहे। दूसरी ओर किंगफिशर की उड़ानें रद्द होने का फायदा जेट एयरवेज और स्पाइसजेट को मिल रहा है।

किंगफिशर वित्तीय संकट में घिरी हुई
एयरलाइन उद्योग के जानकारों का कहना है कि किंगफिशर के घाटे की मुख्य वजह उसकी प्रतिस्पर्धी किराया दरें नहीं, बल्कि कंपनी के कामकाज की शैली और प्रबंधन से जुड़े कई फैसले रहे। किराये की बात की जाए तो, इसमें अच्छा खासा इजाफा देखने को मिलता है। पहले दिल्ली-बंगलूरू रूट का इकनॉमी वर्ग का किराया जहां महज 7 हजार रुपये रखा गया था, वहीं अब इस रूट का टिकट 14 हजार रुपये का मिल रहा है। दिल्ली-मुंबई रूट में भी किराए आसमान पर हैं। पहले इस रूट का टिकट 4,500-5,000 रुपये का मिलता था, जो अब बढ़कर 7,000 रुपये के पार पहुंच गया है। इसी तरह दिल्ली-कोलकाता रूट के हवाई किराए में भी 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इस अच्छी खासी बढ़ोतरी के बावजूद किंगफिशर वित्तीय संकट में घिरी हुई है।

बाकी है अभी उम्मीद की किरण
वित्तीय संकट और तमाम बदहाली के बावजूद किंगफिशर के लिए एक उम्मीद भरी खबर यह है कि कर्जदाता उसे 1,000 करोड़ रुपये की मदद दे सकते हैं। जानकारी के मुताबिक कर्जदाताओं की ओर से किंगफिशर को कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) के रूप में 400 करोड़ रुपये और ब्याज के भुगतान के लिए 500 करोड़ रुपये की रकम दी जा सकती है। इस बारे में अंतिम फैसला करने के लिए किंगफिशर एयरलाइंस के कर्जदाताओं का कंसोर्शियम जल्द ही बैठक करने वाला है। इस बीच कंपनी के सीईओ संजय अग्रवाल ने उम्मीद जताई है कि उड़ाने रद्द होने की दिक्कत अगले 5-7 दिनों में ठीक हो जाएगी।

बदहाली का सफर
- 9 मई को 'वर्ल्ड क्लास सर्विस' के वायदे के साथ मुंबई-दिल्ली के बीच किंगफिशर के पहले विमान ने उड़ान भरी
- जून 2005 में किंगफिशर एयरबस ए-320 का ऑर्डर देने वाली पहली घरेलू एयरलाइन बनी। हालांकि बाद में खस्ताहाली के चलते पांच विमानों का यह ऑर्डर रद्द कर दिया गया।
- जनवरी 2006 में मेट्रो रूटों के अलावा 30 नए रूटों पर किंगफिशर की घरेलू उड़ानें शुरू हुईं।
- अप्रैल 2006 में स्थापना के एक साल के भीतर ही कंपनी को बड़ा झटका लगा, जब मुनाफे के दावों के बावजूद कंपनी को 377 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ा।
- पहले साल से ही शुरू हुआ घाटे का सिलसिला 2009 तक बढ़कर 1,608 करोड़ रुपये पर आ पहुंचा और कंपनी का कर्ज 10,000 करोड़ के स्तर तक बढ़ गया।
- 2011 में पायलटों की व्यापक हड़ताल और भारी संख्या में उड़ाने रद्द होने जैसी दिक्कतों ने कंपनी को घेर लिया और किफायती हवाई सेवा किंगफिशर रेड को बंद कर दिया गया।

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